वासना घी की तरह है, जो बढ़ती ही चली जाती है-वीरेन्द्र शास्त्री

हाथरस-। 115 वां लक्खी मेला मंदिर श्री दाऊजी महाराज के आर्य समाज मुरसान द्वार प्रचार शिविर में कल संध्या यज्ञ हुआ। पं. रूपराम शर्मा , दिनेश अग्निहोत्री व बनवारीलाल गोस्वामीं ने इस पुनींत कर्म को पूर्ण कराया । स्वामीं अमलानन्द सरस्वती , थान सिह तौमर व पुरुषोत्तम फौजी ने सुन्दर भजनों की प्रस्तुति दी।

अन्तर्राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता आचार्य वीरेन्द्र शास्त्री सहारनपुर ने अपने उद्बोधन में कहा कि विद्या दो प्रकार की होती है-परा ,अपरा; नि: श्रेयस, अभ्युदय। पृथ्वी से लेकर परमाणु तक का ज्ञान अपरा विद्या है और आत्मा -परमात्मा संबंधी ज्ञान , मुक्ति का मार्ग परा या नि:श्रेयस कहलाती है । बाहर से भरने का नाम अपरा और भीतर से भरने का नाम परा विद्या है । जो अंदर से भर जाता है, वह बाहर से स्वयं ही भर जाता है । वासना घी की तरह है, जो बढ़ती ही चली जाती है। न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य: ,धन से किसी की तृप्ति नहीं होती है । ईश्वर ने जो-जो रचा है, उसे वह धारण भी करता है । ईश्वर के 5 मुख्य काम हैं- ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , पालन ,कर्म फल व्यवस्था उसके अनुसार न्याय , वेद का ज्ञान और संहार । दान 6 प्रकार का होता है-श्रद्धा ,अश्रद्धा ,हिय , श्रिय, भय और अभय ।उन्होंने भगवान श्री राम और भरत के प्रसंग को सुनाकर सभी श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया ।यह उनके प्रवचन का अंतिम सत्र था। ससम्मान उनकी विदाई की गई। अमूल्य जीवन को सुखमय और आनन्दमय बनाने के लिए सदैव आर्य समाज प्रचार शिविर तत्पर है।

कार्यक्रम में बुद्धसेन आर्य, राजीव आर्य, दिनेश कुमार आर्य, वेदप्रकाश शास्त्री, विश्वनाथ आर्य, कैलाश जैसवाल, पदम कुमार वर्मा, संजीव आंधीवाल, अशोक गुप्ता, तुलाराम सुमन, पुरुषोत्तम राठी, परमहंस आर्य, बौबी लाला, वीरेन्द्र कप्तान, भूपेन्द्र सिंह, वीनायती, विजय कुमारी आर्य, प्रकाशवती आर्य,लीना कुलश्रेष्ठ, मंजू आर्य आदि मौजूद थे।

Dainik Lalsa
Author: Dainik Lalsa

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