
नवरात्रि के प्रथम दिन में भक्त मेरे नौ विग्रह रूपों में मेरे पहले स्वरूप “शैलपुत्री” की उपासना करते हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण मेरा नाम शैलपुत्री पड़ा। मेरे सती स्वरूप द्वारा यज्ञ अग्नि में स्वयं को भस्म करने के पश्चात् मैंने पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। मेरा यह स्वरूप लावण्यमयी एवं अतिरूपवान है। मेरे एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में कमल का फूल सुशोभित होता है। मेरा वाहन वृषभ अर्थात् बैल है। भगवान शंकर की भांति मेरा भी निवास पर्वतों पर है।
प्रत्येक प्राणी में मेरा स्थान नाभि चक्र से नीचे स्थित मूलाधार चक्र में है, यही वह स्थान है जहाँ मेरी शक्ति ‘कुंडलिनी’ के रूप में विराजमान रहती है। नवरात्रि के प्रथम दिन मेरी उपासना में योगी एवं साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। इसी स्थान से योग साधना का प्रारम्भ होता है। मैं साधक को साधना में लीन होने की शक्ति, साहस एवं बल प्रदान करती हूं साथ ही आरोग्य का वरदान भी देती हूं। नवरात्रि के प्रथम दिन जो भक्त सच्ची भक्ति उपासना द्वारा मेरे इस स्वरूप को जागृत करते हैं, मैं उनका निःसंदेह कल्ण करती हूं।’
देवी ने कहा, शैलपुत्री रूप में ऐसे करें मुझे प्रसन्न-देवी संवाद अनुसार देवी का कथन है, ‘मुझे सफेद एवं लाल रंग की चीजें बहुत पसंद हैं, इसलिए नवरात्र के प्रथम दिन मेरे इस स्वरूप के समक्ष मुझे सफेद या लाल रंग के पुष्प अर्पित कर लाल सिंदूर लगाएं, गाय के दूध से बने पकवान एवं मिष्ठान का भोग लगाने से मैं सच्चे भक्त पर प्रसन्न होकर उसकी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हूं, साथ ही भक्त के घर की दरिद्रता को दूर करके उसके घर के सभी सदस्यों को रोगमुक्त कर देती हूं, भक्त को संशय रहित होकर मेरा पूजन करता चाहिए।’ साधना मंत्र – ओम् देवी शैलपुत्र्यै नमः।।












