हाथरस। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान शाखा अलीगढ़ द्वारा श्री राम दरबार मन्दिर में गुरु पूर्णिमा का दिव्य उत्सव मनाया गया। असंख्य भक्त इस आयोजन में सम्मिलित हुए।कार्यक्रम की शुरुआत भजनों की सुंदर प्रस्तुति और वेदमंत्रों के उच्चारण के साथ हुई। श्री गुरुदेव की दिव्य स्मृतियों में विभिन्न भक्तिपूर्ण मधुर भजन गाए गए, जिन्होंने साधकों एंव गुरुदेव के प्रति असीम भक्ति, प्रेम और समर्पण से भर दिया। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद एक स्वर, एक मन, एक स्वर से आरती गाई गई।। दिव्य गुरु की दिव्य स्मृति में प्रेरक विचार प्रस्तुत किए और सभी को गुरुदेव के मार्गदर्शन और निर्देशों का ईमानदारी से पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी ने प्रार्थना की, कुछ ने आशीर्वाद मांगा, कुछ ने उनका साथ मांगा, कुछ ने दिशा पूछी और कुछ ने सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना की। आँखों में आँसू और हृदय में भक्ति के साथ, प्रत्येक ने अपने भीतर दिव्यता को महसूस किया और परम शांति का अनुभव किया।

गुरुदेव की शिष्या साध्वी सुश्री अनुराधा भारती ने प्रवचनों व साध्वी उर्मिला भारती, साध्वी सुषमा भारती, साध्वी रेनू भारती ने भजनों के माध्यम से समझाया गया कि गुरु पूर्णिमा एक शिष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह गुरु के प्रति प्रेम और कृतज्ञता प्रकट करने का दिन है। यह दिन गुरु और उनके शिष्यों के बीच शाश्वत बंधन को उजागर करता है। यह एक शिष्य के लिए अपने गुरु की पूजा करने और सतगुरु के प्रति अंतरतम और गहरी कृतज्ञता अर्पित करने का अवसर है। शिष्यों के लिए गुरु का जो महत्व है, उसे किसी भी चीज़ से नहीं मापा जा सकता, क्योंकि इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी तुलना शिष्यों के लिए गुरु के प्रेम से की जा सके। दूसरी ओर शिष्य केवल गुरु की कृपा का प्रत्युत्तर उन्हें आत्मिक कृतज्ञता अर्पित करके देने का प्रयास कर सकते हैं, वह भी तब जब गुरु स्वयं इसके लिए अवसर प्रदान करें। ऐसा ही एक शुभ अवसर गुरु पूर्णिमा के दिन आता है, जब गुरु शिष्यों को अपना प्यार दिखाने का दुर्लभ मौका देते हैं।
आदि गुरु शंकराचार्य ने कहा है कि
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रह-हेतुकम्|
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुष-संश्रयः॥
अर्थात् मनुष्य शरीर में जन्म, मोक्ष प्राप्ति की इच्छा और महापुरुषों का संग- यह तीनों अत्यंत दुर्लभ हैं और ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होते हैं। इस कृपा को मानव के जीवन में पूर्ण सद्गुरु प्रदान करते हैं। वे मानवता को सत्य का मार्ग देकर जीवन जीने का सही तरीका बताते हैं। वे मनुष्य को ज्ञान दीक्षा के समय ही अपने भीतर भगवान के प्रकाश रूप के साक्षात दर्शन कराते हैं। हम सभी बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें ऐसे पूर्ण सतगुरु श्री आशुतोष महाराज जी की शरण मिली है। गुरु महाराज जी की असीम दया उनके प्रत्येक शिष्य पर हर पल बरस रही है। उनके ओजस्वी वचन और मार्गदर्शन हमारे जीवन के हर पथ को आलोकित कर रहे हैं। सतगुरु सदैव चाहते कि उनका शिष्य श्रेष्ठ बने और उसके गुणों की समाज में पूजा हो।पूज्य गुरुदेव की भी यही इच्छा है कि उनके प्रत्येक शिष्य का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाए ताकि एक नए अलौकिक इतिहास का निर्माण हो सके। अंत में दिव्य गुरु की सुमंगल आरती हुई , जिसके बाद सैकड़ों भक्तों ने जोर शोर से जयकारे लगाये गए।तत्पश्चात प्रसाद वितरण हुआ।











