हाथरस। संत तुलसी साहिब द्वारा हस्तलिखित अमूल्य ग्रंथ “घट रामायण” ऐतिहासिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक महत्व है और यह धरोहर केवल आश्रम की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण संत परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की अमूल्य निधि है।आश्रम की गौरवशाली गुरु-परंपरा, इतिहास एवं आध्यात्मिक विरासत वर्षों से चली आ रही है। संत तुलसी साहिब आश्रम की पूरी दुनिया में मान्यता है और भक्ति रूप बसंत फैली हुई है और यह हाथरस की धरा का ऐतिहासिक इतिहास है।। उक्त बातें मुख्य आचार्य गद्दी मंदिर श्री तुलसी साहिब आश्रम सीयल किला गेट में वर्तमान मुख्य गुरु एंव मुख्य आचार्य व मुख्य गद्दीधर श्री महंत गुरु लोचन दास साहिब जी महाराज ने पत्रकार वार्ता आयोजित कर आश्रम की गौरवशाली गुरु-परंपरा, इतिहास एवं आध्यात्मिक विरासत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हाल ही में एक पूर्व जनप्रतिनिधि द्वारा समाचार पत्रों के माध्यम से आश्रम के वर्तमान मुख्य गुरु, मुख्य आचार्य एवं मुख्य गद्दीधर के संबंध में भ्रामक एवं तथ्यहीन बातें प्रचारित की गईं, जिनका वास्तविक तथ्यों के आधार पर खंडन करना आवश्यक था।

पत्रकारों को संबोधित करते हुए श्री महंत गुरु लोचन दास महाराज ने संत शिरोमणि संत तुलसी साहिब के जीवन, उनके आध्यात्मिक संदेश तथा आश्रम की ऐतिहासिक परंपरा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि संत तुलसी साहिब के उपरांत आश्रम की गुरु-परंपरा क्रमशः श्री महंत सूर स्वामी साहिब, श्री महंत दर्शन दास साहिब, श्री महंत मथुरा दास साहिब, श्री महंत संत प्रकाश दास साहिब, श्री महंत गुरुदयाल दास साहिब तथा श्री महंत गुरु शरण दास साहिब द्वारा आगे बढ़ाई गई। इन सभी संतों के समाधि लेने के उपरांत वर्तमान में आश्रम की मुख्य गद्दी का दायित्व उन्हें सौंपा गया, जिसका निर्वहन वे गुरु-परंपरा एवं मर्यादा के अनुरूप कर रहे हैं।
उन्होंने पत्रकारों को आश्रम में सुरक्षित संत तुलसी साहिब द्वारा हस्तलिखित अमूल्य ग्रंथ “घट रामायण” का अवलोकन भी कराया तथा इसके ऐतिहासिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक महत्व की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह धरोहर केवल आश्रम की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण संत परंपरा और भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति की अमूल्य निधि है।पत्रकार वार्ता के प्रारंभ में संत शिरोमणि संत कबीर दास जी की जयंती के अवसर पर उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धापूर्वक नमन किया गया।। वक्ताओं ने कहा कि संत कबीर दास ने अपने निर्भीक विचारों, सामाजिक समरसता, सत्य, प्रेम एवं मानवता के संदेश से समाज को नई दिशा प्रदान की। उनके बताए मार्ग पर चलकर ही एक समतामूलक और आध्यात्मिक समाज का निर्माण संभव है।
इस अवसर पर आश्रम सेवा साथी चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने संतो की वाणी का उल्लेख करते हुए कहा—
राज सितारा पूना छोड़ा, तुलसी वन सुख पाई है।राजसभा तुलसी नहीं भावे, संत सभा मन भायी है।
उन्होंने कहा कि संत तुलसी साहिब ने सांसारिक वैभव का त्याग कर मानवता, आध्यात्मिकता और संत परंपरा का मार्ग अपनाया। आज आवश्यकता है कि उनके संदेश को समाज तक सही स्वरूप में पहुंचाया जाए तथा किसी भी प्रकार की भ्रांतियों से बचा जाए।
पत्रकार वार्ता में आशु कवि अनिल बौहरे, डॉ. अनार सिंह अग्र पूर्व प्रधानाचार्य,जीवनलाल शर्मा किडजी प्ले स्कूल के प्रबंधक,पूजा वर्मा, दिनेश गांधी, अनिकेत गोलू सहित अनेक नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित थे।









