स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ समझने की आवश्यकता
आज चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है। आधुनिक जाँच तकनीकें, उन्नत शल्य चिकित्सा, आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ और प्रभावी औषधियाँ असंख्य लोगों का जीवन बचा रही हैं। इसके बावजूद मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, थायरॉयड विकार, कैंसर, मानसिक तनाव और अनेक जीवनशैली संबंधी रोग निरंतर बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न विचारणीय है कि समस्या केवल चिकित्सा व्यवस्था में है या हमारी जीवनशैली और स्वास्थ्य की समझ में भी?
भारतीय आयुर्वेद का मानना है कि स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है। चरक और सुश्रुत के अनुसार मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि और आत्मा भी स्वास्थ्य के अभिन्न अंग हैं। इसलिए किसी भी रोग को समझने के लिए केवल प्रयोगशाला की रिपोर्ट पर्याप्त नहीं होती, बल्कि रोगी की प्रकृति, उसकी दिनचर्या, आहार, मानसिक स्थिति, पाचन शक्ति, नींद, तनाव और जीवनशैली का भी सम्यक् मूल्यांकन आवश्यक है।
आज चिकित्सा में प्रयोगशाला जाँचों का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। रक्तचाप, रक्त शर्करा, थायरॉयड, कोलेस्ट्रॉल, विटामिन, कैल्शियम और अन्य अनेक मानकों के आधार पर रोग का मूल्यांकन किया जाता है। निस्संदेह इन जाँचों का अपना वैज्ञानिक महत्व है और अनेक गंभीर रोगों के निदान में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। किंतु केवल आँकड़ों के आधार पर स्वास्थ्य का अंतिम निर्णय कर देना भी उचित नहीं माना जा सकता।
इसी कारण अधिकांश पैथोलॉजी रिपोर्टों पर लिखा होता है—”Please correlate with clinical condition.” अर्थात् रिपोर्ट का मूल्यांकन रोगी की वास्तविक नैदानिक स्थिति और लक्षणों के साथ किया जाना चाहिए। यह स्वयं इस बात का संकेत है कि रिपोर्ट निदान का एक भाग है, संपूर्ण सत्य नहीं।
आयुर्वेद प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट मानता है। दो व्यक्तियों में एक जैसी रिपोर्ट होने पर भी उनकी प्रकृति, अग्नि, दोषों की स्थिति, मानसिक अवस्था और उपचार की आवश्यकता अलग-अलग हो सकती है। यही कारण है कि आयुर्वेद व्यक्तिगत चिकित्सा (Individualized Medicine) पर बल देता है।
दूसरी ओर आज समाज में स्वास्थ्य के प्रति भय का वातावरण भी बढ़ा है। अनेक लोग स्वयं को स्वस्थ महसूस करने के बावजूद केवल किसी रिपोर्ट के थोड़ा ऊपर-नीचे होने से मानसिक तनाव में आ जाते हैं। कई बार आवश्यक उपचार के साथ-साथ अनावश्यक जाँचों, भय और दवाओं का चक्र भी शुरू हो जाता है। यह स्थिति रोगी के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आधुनिक चिकित्सा या जाँचों का विरोध किया जाए। आपातकालीन चिकित्सा, संक्रमण, दुर्घटनाएँ, शल्य चिकित्सा और अनेक गंभीर रोगों में आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियाँ अत्यंत मूल्यवान हैं। आवश्यकता विरोध की नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण की है।
स्वास्थ्य का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि उचित आहार, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, संयमित जीवन, मानसिक संतुलन, व्यायाम तथा प्रकृति के अनुरूप जीवनशैली है। यदि इन मूल सिद्धांतों की उपेक्षा की जाएगी, तो केवल दवाओं के सहारे समाज को स्वस्थ बनाना कठिन होगा।
आयुर्वेद का प्रसिद्ध स्वास्थ्य सूत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है—
“समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”
अर्थात् जिसके दोष, अग्नि, धातु और मल संतुलित हों तथा आत्मा, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न हों, वही वास्तव में स्वस्थ है।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वास्थ्य को केवल रिपोर्टों की संख्याओं से न आँकें, बल्कि अपने शरीर की भाषा को समझें। चिकित्सक की सलाह लें, आवश्यक जाँच कराएँ, परंतु साथ ही अपने आहार, व्यवहार, विचार और जीवनशैली की भी जिम्मेदारी स्वयं लें।
यदि समाज स्वास्थ्य के प्रति यह संतुलित दृष्टिकोण अपनाए, तो अनेक जीवनशैली संबंधी रोगों की रोकथाम संभव है। अंततः स्वास्थ्य का सबसे बड़ा आधार न तो केवल मशीन है और न केवल दवा, बल्कि जागरूक व्यक्ति, संतुलित जीवनशैली और समग्र चिकित्सा दृष्टि है।
— वैद्य पुनीत अग्निहोत्री
आरोग्यशाला
12, लक्ष्मी सिटी सेंटर, सादाबाद गेट, हाथरस









