*शीत शिशिर हेमंत का, हआ परम प्राधान्य।*
*तेल, तूल, तपन का, सब जग में है मान्य

यह दोहा (श्लोक) *हेमंत और शिशिर ऋतु* के महत्व और उस दौरान तेल, ऊन (तूल) और गर्मी (तपन) के उपयोग को बताता है, जिसका अर्थ है कि सर्दी के इन महीनों में तेल मालिश, गर्म कपड़े और शरीर को भीतर-बाहर से गर्म रखना स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी समय शरीर की जठराग्नि तेज़ होती है और कफ जमा होता है, जिसे संतुलित रखने के लिए स्निग्ध और गर्म चीज़ों का सेवन व देखभाल आवश्यक है।
*अर्थ का विश्लेषण:*
“शीत शिशिर हेमंत का, हआ परम प्राधान्य”: सर्दी के मौसम (हेमंत और शिशिर ऋतु) का बहुत महत्व है, क्योंकि यह वह समय होता है जब शरीर में कफ जमा होता है और जठराग्नि (पाचन अग्नि) बढ़ती है, जिसे ठीक से संभालने की आवश्यकता होती है।
“तेल, तूल, तपन का, सब जग में है मान्य”: इस मौसम में तेल की मालिश (स्नेहन), ऊन (तूल) के गर्म वस्त्र और शरीर को भीतर-बाहर से गर्म रखना (तपन) पूरे संसार में (आयुर्वेद के अनुसार) मान्य और लाभदायक है।
*सारांश:*
यह दोहा आयुर्वेद के ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार दिनचर्या) का पालन करने की सलाह देता है, जिसमें *हेमंत (नवंबर-दिसम्बर) और शिशिर (जनवरी-फरवरी) ऋतुओं* में शरीर को तेल से मालिश करके, ऊनी कपड़े पहनकर और गर्म तासीर वाले खाद्य पदार्थों (जैसे अदरक, सोंठ) का सेवन करके स्वस्थ रखने पर जोर दिया गया है, ताकि सर्दी-जुकाम और कफ से जुड़ी बीमारियों से बचा जा सके।

डॉ कुणाल वार्ष्णेय
होम्योपैथी विशेषज्ञ
पूर्व सचिव – HMAI हाथरस
वार्ष्णेय होम्योपैथिक क्लिनिक
चूना वाला डंडा चौराहा, सादाबाद गेट, हाथरस
मो. 9319822121









