देश के साथ-साथ विदेशों में भी आज याद किये जायेंगे पं. नथाराम गौड़ हाथरसी

देश के साथ-साथ विदेशों में भी आज याद किये जायेंगे पं. नथाराम गौड़ हाथरस

हाथरस-13 जनवरी। देश और विदेश में अपनी लेखनी और रंगमंच के माध्यम से ब्रज की देहरी हाथरस का नाम रोशन करने वाले हाथरसी सांगीत युगपुरुष और नौटंकी के जनक पंडित नथाराम गौड़ ने वास्तव में हाथरस के नाम को विश्व स्तर पर स्थापित किया था यह तो हम सभी जानते हैं किंतु उन्हीं युगपुरुष पण्डित नथाराम गौड़ को आज हम सब भूलते जा रहे हैं।

एक जमाना था जब उनके नाम की उत्तर भारत के साथ साथ विदेशों में भी तूती बोलती थी किन्तु आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी उनके बारे में जानती तक नहीं है। हाथरस नगर पालिका के प्रयासों से उनके नाम पर अलीगढ़ रोड का नाम बदल कर प. नथाराम गौड़ मार्ग हो गया है लेकिन उन जैसे महापुरुष के लिये यह काफी नहीं है। अपने ही शहर में विलुप्तीकरण के कगार पर हैं पण्डित नथाराम गौड़ और उनका हाथरसी स्वांग।

 

भगत-स्वांग नौटंकी जैसी लोकधर्मी रंगमंचीय विधा अब अपनों के मध्य ही बेगानी हो गयी हैं,अब तो यह बस दाऊजी मेले और इसके पुरोधा प. नथाराम गौड़ की जयन्ती पर ही नक्कारे की खनक के साथ सुनने को मिलती है। वर्तमान पीढ़ी में तो इसके प्रति अब कोई खास लगाव भी नहीं देखा जा रहा है किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. खेमचन्द यदुवँशी ने अवश्य इस लोक विधा को देश और विदेशों में आज भी जीवंत बना रखा है। डॉ. यदुवंशी के प्रयासों से ही विगत मार्च और अप्रैल माह में संस्कृति निदेशालय लखनऊ की भारतेन्दु नाट्य अकादेमी व लोक व जनजाति कला एवं संस्कृति संस्थान,लखनऊ द्वारा हाथरसी सांगीत का 63 बच्चों को प्रशिक्षण दिया गया। यही नहीं डॉ. यदुवंशी के निर्देशन पं. नथाराम गौड़ अंतर्राष्ट्रीय रंगमंडल द्वारा विगत विजयदशमी पर्व पर भूटान सरकार के आमंत्रण पर नौटंकी शैली में दस दिवसीय रामलीला का मंचन राजधानी थिम्पू में किया गया,इसी प्रकार यह रंगमंडल देश की धरती के साथ साथ अब तक 18 देशों में अनेकानेक मंचन कर चुका है।

 

आज प. नथाराम गौड़ की 152वीं जयन्ती के अवसर पर उनके चाहने वालों के द्वारा देश और विदेशों में उन्हें याद किया जा रहा है, मुख्य आयोजन उनकी कर्म स्थली श्याम प्रेस में सुबह 11:00 बजे से आयोजित किया जाएगा जिसके प्रथम चरण में युगपुरुष पण्डित नथाराम जी के कृतित्व व व्यक्तित्व पर चर्चा के उपरांत कला उन्नायक व अनुरागी कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा तदोपरांत द्वितीय चरण में पं. नथाराम गौड़ जी द्वारा रचित सांगीत- पद्मावती रणवीर का मन्चन किया जाएगा।

पं. नाथराम गौड़ की पौत्रवधु व प. नथाराम गौड़ लोकसाहित्य शोध-संस्थान की अध्यक्ष शशिबाला गौड़, प्रपौत्र आशीष, उपनीत व राहुल गौड़ ने सभी कला प्रेमियों को इस कृतज्ञता-अनुष्ठान में समय से पधारने की अपील की है।

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भगत-सांगीत नौटंकी का इतिहास:

बताते चलें कि 7वीं शताब्दी में ब्रज के मन्दिर सङ्गीत से इस विधा का उदय हुआ, कालांतर में यह विधा मंदिरों से निकल कर भगतलीला के मंच के माध्यम से आम जनमानस तक पहुँची। 13वीं शताब्दी में पनपी ख्याल-लावनी सूफी परम्परा की भाँति इसके मथुरा,आगरा और वृन्दावन में अखाड़े स्थापित किये गए जहाँ से तत्कालीन डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ द स्कूल वासुदेव वासम जी द्वारा इस लोकलुभावनी विधा को सन 1870 में हाथरस में स्थापित किया गया तथा इसके हाथरस में भी अनेक अखाड़े बने। हाथरस के अखाड़ा इन्द्रमन के शिष्य पण्डित नथाराम गौड़ ने इस विधा को अखाड़ों से निकाल कर आम जनमानस तक पहुंचाने का जो कार्य किया वह बहुत बड़ा कार्य रहा।तदोपरांत स्वांग की दो शैलियाँ विकसित हुई पहली हाथरस शैली और दूसरी कानपुर शैली। कानपुर शैली पारसी मंच और फूहड़ता के कारण अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई किन्तु हाथरसी शैली की अपनी पहचान आज भी है किन्तु वर्तमान में अब इस कला के पुरोधाओं की स्मृतियाँ ही शेष हैं। मध्य एशिया, दक्षिणी अमेरिका,वर्मा,फिज़ी, मलेशिया,रंगून,नेपाल,भूटान,इंग्लैण्ड, कनाडा,मॉरीशस आदि देशों में आज भी हाथरस के पण्डित नथाराम गौड़ के स्वांगों को पसंद करते हैं।

हालांकि मथुरा, लखनऊ,कानपुर,प्रयागराज, वाराणसी आदि क्षेत्रों में पण्डित नथाराम गौड़ द्वारा लिखित स्वांगों को सरकारी मंचों पर केवल थियेटर शैली में मंचन करने वाले दलों की अच्छी खासी संख्या है लेकिन हाथरस में भगत-सांगीत नौटंकी का वह कद अब नहीं रहा जो कला पुरोधाओं ने इस क्षेत्र को ऊंचाई दी थी। वर्तमान में गिने चुने ही कलाकार इस विधा को बचाने में लगे हुए हैं।

विगत वर्षों में कॉमनवेल्थ गेम्स,सङ्गीत नाटक अकादमी दिल्ली व लखनऊ, भारत लोककला भवन उदयपुर, जवाहर कला केन्द्र जयपुर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय व इंदिरा कला केंद्र नई दिल्ली के आज़ादी के अमृत महोत्सव व चौरी चौरा काण्ड के शताब्दी समारोह में उत्तर प्रदेश सांगीत नाटक अकादमी के मंच के साथ साथ ताज महोत्सव,ब्रज रज महोत्सव और घर घर तिरंगा राष्ट्रीय राष्ट्रीय मंच पर मथुरा व हाथरस के कुछ कलाकारों ने वरिष्ठ साहित्यकार व लोककलाविद डॉ. खेमचन्द यदुवँशी के निर्देशन में पण्डित नथाराम गौड़ के अनेकानेक स्वांगों के मन्चन किया है किन्तु हाथरस की भूमि पर आज भी बेहद सन्नाटा पसरा हुआ है।

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*आखिर कौन थे प. नथाराम गौड़:*

हाथरसी स्वांग के युगपुरुष पण्डित नथाराम गौड़ का जन्म थाना हाथरस जंक्शन के गाँव दरियापुर में 14 जनवरी, 1874 ई. में हुआ था।उनके पिता का नाम भागीरथ मल तथा माता का नाम इंदिरा देवी था जो अत्यंत विनम्र स्वभाव के थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में ही हाथरस के उस्ताद इन्द्रमन का सानिध्य प्राप्त हुआ तथा उस्ताद मुरलीधर रॉय ने उन्हें हिन्दी, उर्दू , संस्कृत व अंग्रेजी की शिक्षा दिलाई थी। इसी के साथ गायन, अभिनय, नृत्य व लेखन कला में पारंगत होकर सन 1890 के आसपास उन्होंने बुर्स अखाड़ा नामक स्वतंत्र अखाड़ा स्थापित किया,कालान्तर में ‘नत्था-चिरन्जी स्वांग मंडली’ के नाम से व्यावसायिक रूप देते हुए स्वरचित स्वांग मंचित कर हाथरसी स्वांग विधा से विश्व स्तर पर जनमानस को परिचित कराया। उनके लिखे लगभग 230 स्वांग आज भी पण्डित नथाराम गौड़ लोकसाहित्य शोध-संस्थान के पुस्तकालय में मौजूद हैं।

*क्या है इस लोकविधा का भविष्य:*

वर्तमान में हाथरसी स्वांग का कोई भी उज्ज्वल भविष्य नज़र नहीं आ रहा है क्योंकि स्वांग के कलाकार इस लोककला के प्रति ईमानदार नहीं हैं, जिस विधा से उनकी रोजीरोटी चलरही है वह उसी को कोसते रहते हैं, पुरानी धरोहर को बचाना नहीं चाहते और नया कुछ करना नहीं चाहते। यही नहीं अपने बच्चों तक को इससे दूर रखते हैं, यदि समय रहते इस विधा को संरक्षित नहीं किया गया तो इसे इतिहास के पन्नों में ढूँढते रह जायेंगे।

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डॉ. खेमचन्द यदुवँशी

(अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ लोकनाट्यविद व साहित्यकार)

 

“पं. नथाराम गौड़ जी ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किये पहला तो यह कि परम्परागत अखाड़ों की सीमाओं तक सीमित भगत-सांगीत विधा को आम जनमानस के मध्य लाये व इसे विश्व स्तर पर स्थापित किया और दूसरा यह कि अपना लगभग 230 आलेखों से अधिक का साहित्य अपने श्याम-प्रेस में प्रकाशित कर संरक्षित कर दिया जिससे असंख्य कलाकार आज भी अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। उनके ही प्रयासों से हाथरसी स्वांग आज तक संरक्षित है अन्यथा परम्परागत भगत के अखाड़ों का साहित्य तो विलुप्त हो चुका है।“

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राहुल गौड़

(प्रपौत्र पण्डित नथाराम गौड़)

 

“नगर पालिका हाथरस के द्वारा तालाब चौराहा से सासनी तक पं. नथाराम गौड़ जी के नाम से

मार्ग का नामकरण करके स्तुत्य कार्य किया है जिसे इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। वास्तव में हाथरस की भूमि स्तुतियोग्य है क्योंकि एक जमाना था जब मेरे परदादा पण्डित नथाराम गौड़ जी स्वयं श्याम-प्रेस में बैठ कर स्वांग लिखते और हर साल नया कथानक लिख कर देवछट के मेले में मंचित कराते थे फिर घूमघूम कर देश विदेश में मन्चन के माध्यम से हाथरस का नाम रोशन किया करते थे, हमें उनके वंशज होने पर अत्यंत गर्व है।”

Dainik Lalsa
Author: Dainik Lalsa

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