युवा विज्ञानियों को इंस्पायर करके उनमें जिज्ञासा जगाइए-गौरव पाठक


हाथरस। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों को याद करने का ही नहीं, बल्कि बच्चों, युवाओं से लेकर आमजन में वैज्ञानिक सोच को विकसित करने का अवसर भी बनना चाहिए। अगर भारत को विकसित देश बनना है, तो उसमें विज्ञान की बड़ी अहम भूमिका होगी। यह भूमिका तभी सार्थक होगी, जब हम वैज्ञानिक शोधों को अपनी कार्य संस्कृति का हिस्सा बना लें। इसके लिए आवश्यक होगा कि हम बुनियादी स्तर से ही बच्चों को ऐसी जानकारियां देने के उपाय करें, जो उनमें वैज्ञानिक सोच के विकास में सहायक बने। इसके लिए पारंपरिक ज्ञान के साथ ही वैज्ञानिक स्वभाव भी विकसित करना होगा।
उक्त बातें नेहरू स्मारक भगवानदास इंटर कॉलेज मेंण्डू के विज्ञान शिक्षक गौरव पाठक ने कहते हुए बताया कि श्री नेहरू स्मारक भगवानदास इंटर कॉलेज मेंण्डू इसके लिए बच्चों को हर तरह के सवाल पूछने के लिए भी प्रोत्साहित करना होगा। बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पेश करने के लिए उनमें आसपास की चीजों को समझने के प्रति कौतूहल भी पैदा करना होगा। पढ़ाई में रटने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि हमारे बच्चे प्रयोगशालाओं में प्रयोग करें और अपनी गलतियों से सीखें। करके सीखने अर्थात लर्निंग बाय डूइंग के माध्यम से छात्रों के सैद्धांतिक ज्ञान को वास्तविक प्रयोगशाला के अनुभवों में सहायता मिलेगी।
हालांकि यह सिर्फ सोचने भर से नहीं होगा। इसके लिए हमें गांवों से लेकर शहरों तक स्कूलों में अच्छी विज्ञान प्रयोगशालाओं का व्यापक जाल बिछाना होगा। इसी सोच से प्रेरित भारत सरकार द्वारा गत वर्ष अक्टूबर तक 10,000 से अधिक अटल टिंकरिंग लैब स्थापित की जा चुकी हैं और अगले पांच वर्षों में 50,000 नई अटल टिंकरिंग लैब्स स्कूलों में स्थापित करने की योजना बनाई है।
उन्होंने कहा है कि नीति आयोग के अटल इनोवेशन मिशन के तहत इन लैब्स का उद्देश्य कक्षा 6 से 12 तक के छात्रओं में वैज्ञानिक जिज्ञासा, रचनात्मकता और स्टेम (साइंस-टेक्नोलाजी इंजीनियरिंग-मैथ) कौशल को बढ़ावा देना है। यह पहल हर जिले में तकनीक आधारित नवाचार को बढ़ावा देगी। इसी क्रम में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआइआर का जिज्ञासा कार्यक्रम स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक चेतना और जिज्ञासा जगाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य करके सीखने (लर्निंग बाय डूइंग) के माध्यम से छात्रों के सैद्धांतिक ज्ञान को वास्तविक प्रयोगशाला के अनुभवों से जोड़ने में सहायक हो रहा है। इसरो का युविका (युवा विज्ञानी कार्यक्रम) स्कूली बच्चों में विज्ञान और अंतरिक्ष तकनीक के प्रति गहरी समझ और रुचि विकसित करने के लिए एक शानदार पहल है। इसे कैच देम यंग यानी छोटी अवस्था में ही स्कूली छात्रों में अंतरिक्ष विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान के प्रति रुचि जगाकर उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से आकार दिया गया है। दो सप्ताह के इस आवासीय कार्यक्रम में छात्रों को प्रख्यात विज्ञानियों से मिलने, प्रयोगशालाओं का दौरा करने और व्यावहारिक प्रयोग (माडल राकेट्री) करने का अवसर भी मिलता है। राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस भी बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। यह कार्यक्रम छात्रों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर उन्हें वास्तविक दुनिया की समस्याओं को वैज्ञानिक पद्धति से सुलझाने के, लिए प्रेरित करता है।
एनसीईआरटी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय बाल वैज्ञानिक प्रदर्शनी भी बच्चों में वैज्ञानिक सोच और जिज्ञासा को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम बन गई है। यह प्रदर्शनी केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि युवा मस्तिष्कों में नवाचार रचनात्मकता का संचार करने वाला एक उत्सव है। राष्ट्रीय बाल वैज्ञानिक प्रदर्शनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विजन के अनुरूप बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही है। इसी प्रकार इन्सपायर अवार्ड मानक प्रतियोगिता भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है, जो स्कूली बच्चों में न केवल विज्ञान के प्रति रुचि पैदा कर रही है, बल्कि उनमें एक गहरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित कर रही है। यह योजना बच्चों को अपने आसपास की समस्याओं को पहचानने और उनके लिए मौलिक समाधान सोचने के लिए प्रेरित करती है। ये सब प्रयास तब और रंग लाएंगे, जब देश का उद्योग जगत अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप वैज्ञानिक अध्ययन संस्थानों से गठजोड़ करके अनुसंधान का सिलसिला शुरू कर उसे गति प्रदान करे। अगर शिक्षा और उद्योग क्षेत्र में यह साझेदारी विकसित हो जाती है तो भारत को जल्द विकसित राष्ट्र चनने से कोई नहीं रोक सकता।
उन्होंने कहा है कि भारत के कुछ गिने-चुने ऐसे संस्थान हैं, जिन्होंने अपनी प्रगति और कामयाबी से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इसरो इनमें सबसे आगे है, लेकिन भारत को विकसित राष्ट्र बनने के लिए इकलौते इसरो या आइआइटी से ही काम नहीं चलने वाला। हमें देश के अन्य उच्चस्तरीय संस्थानों में भी रिसर्च का एक बेहतर इकोसिस्टम विकसित करना होगा। यह भी ध्यान रखा जाए कि शोध अनुसंधान का मतलब केवल पीएचडी कर लेना नहीं है। शोध तभी सफल है जब उसके केंद्र में यह बिंदु हो कि दैनिक जीवन को सुगम बनाने के लिए यह क्या योगदान कर सकता है? विज्ञान तभी सार्थक है जब कोई भी सामान्य समझ वाला व्यक्ति उसे आसानी से आत्मसात कर उसका उपयोग कर सके।

Dainik Lalsa
Author: Dainik Lalsa

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