इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीलिंग कार्यवाही को बताया प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध: सीलिंग कार्यवाही की रदद 48 घंटे में फोकस अल्ट्रासाउंड सेंटर खोलने के निर्देश

 

हाथरस इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शहर के मेण्डू रोड स्थित स्थित फोकस अल्ट्रासाउंड एंड इमेजिंग सेंटर को सील किए जाने की कार्यवाही को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया है। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने फोकस अल्ट्रासाउंड सेंटर के डायरेक्टर डॉ. विकास कुमार शर्मा की याचिका पर आदेश दिया है कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के 48 घंटे के भीतर सेंटर की सील खोली जाए।
उच्चन्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता डॉ. विकास कुमार शर्मा को सीलिंग से पूर्व प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि सीलिंग से पहले कारण बताओ नोटिस विधिवत तामील किया गया था। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि सीलिंग का आदेश 2 जून को पारित किया गया तथा 3 जून को उसी दिन उसकी प्रति देकर तत्काल परिसर सील कर दिया गया। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर ही नहीं मिला, जो प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।
खंडपीठ ने यह भी संज्ञान लिया कि फोकस अल्ट्रासाउंड एंड इमेजिंग सेंटर का पंजीकरण मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा निरीक्षण के उपरांत वर्ष 2030 तक नवीनीकृत किया गया था। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी प्रकार का उल्लंघन पाया जाता है तो सक्षम प्राधिकारी विधि के अनुसार कार्यवाही कर सकता है, किंतु बिना उचित सुनवाई के एक संचालित चिकित्सा संस्थान को सील करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने राज्य सरकार की इस आपत्ति को भी अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक अपील का उपाय उपलब्ध था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब मामला प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का हो, तब संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा सकता है। हालाँकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने भवन निर्माण अथवा अन्य आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। सक्षम प्राधिकारी यदि आगे कोई कार्यवाही करता है तो उसे याचिकाकर्ता को सभी शिकायतों, निरीक्षण रिपोर्टों एवं अन्य दस्तावेजों की प्रतियाँ उपलब्ध करानी होंगी, उत्तर देने के लिए पर्याप्त समय देना होगा तथा व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद ही विधिसम्मत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।
इस निर्णय को प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया तथा विधि के शासन के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करने वाला एक महत्वपूर्ण आदेश माना जा रहा है।

Dainik Lalsa
Author: Dainik Lalsa

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