नारी के प्रति बढ़ती हैवानियत : जिम्मेदार कौन?

कैसे बचेंगी बेटियां? समाज में बढ़ते अपराध के चरण: 13 साल की मासूम बच्ची से हैवानियत: नैतिक पतन की पराकाष्ठा


पिछले कई दिनों से एक छोटी बच्ची (जो 13 वर्ष की थी, जिसका 32 लोगों द्वारा बलात्कार किया गया) का केस बहुत चर्चा में है। लोगों का गुस्सा फूट रहा है, फांसी की सजा की मांग कर रहे हैं, संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं, दुःख जता रहे हैं, होटलों को तोड़ने की बात कह रहे हैं (जिन होटलों में बच्ची के साथ गलत हुआ है)। मैं भी बहुत दुःखी हूं और वह दुःख जो छोटी बेटी ने झेला, जो दर्द उसने सहा और आज उस दर्द को लेकर वह बेटी इस संसार से विदा भी हो गई। उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। कई बार मैं रो भी चुकी हूं तो अब आंसू भी नहीं हैं, हां अब हैं तो मेरे पास कुछ सवाल, जो बेटी छोड़कर गयी है।। मैं पूछना चाहती हूं (जिसमें महिलाएं व पुरुष दोनों) वह बेटी तो गई हम से विदा लेकर लेकिन क्या इस बेटी से पहले इसी तरह अनेकों बेटियां नहीं मरी हैं? और क्या आगे अब ऐसा नहीं होगा? क्या इस बात की भी कोई गारंटी है। क्या इनको फांसी होने पर आगे कोई ऐसा नहीं करेगा यह बात पक्की है? नहीं क्यों? क्योंकि यदि मरने से लोग डरते, फांसी से लोग डरते तो आपने देखा होगा जो तंबाकू है, गुटका है उसे खाने से सब जानते हैं कि कैंसर होता है और जीवन चला जाता है ,परंतु फिर भी लोग धड़ल्ले से खा रहे हैं। शराब पीना व धूम्रपान करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है फिर भी लोग धडल्ले से इनका सेवन कर रहे हैं। क्योंकि उनको लगता है इससे कैंसर हमें नहीं दूसरों को होता है। वैसे ही जो बलात्कारी है उसको लगता है कि हमको सजा नहीं मिलेगी, क्योंकि मैं साक्ष्य छुपा लुंगा या शक्ति से, पैसे से बात बना लूंगा। तो फिर इसका समाधान क्या है?
अपराधियों की पैदावार के लिए पूरा समाज जिम्मेदार होता है, जिस समय हम समाज में चाहे कैसी भी खुशी की बात हो हम उसको सारी रात डांस, रोमांस, दारू का पैक, नशीली लड़की, लड़की लंदन से लाएंगे, डीजे बजाएंगे, दारू पिलाएंगे, मौज उडायेंगे, तू चीज बडी है मस्त मस्त….. जैसे गाने बजाकर समाज के लोग बेशर्मों की तरह थिरकते हैं, तो जब उसे कार्य रूप देने का मौका मिलता है तो वह इसे क्यों छोड़ेंगे। हमने वह विचार संगीत के माध्यम से सबके दिमाग में डाल दिए। अब वह समय पर अपना असर जरूर दिखायेंगे। स्कूलों में छोटे-छोटे बच्चों की प्रस्तुति- एक लडकी को देखा तो ऐसा लगा…, छोटी बच्चियों की प्रस्तुति- मैं कच्ची कली मेरा मासूम चेहरा…., बेबी डाॅल मैं सोने दी…., महिलाओं की प्रस्तुति- छत पर सोया था बहनोई…, कैसी समाज का निर्माण करेगी? यदि बच्चे गाते- एक नारी को देखा तो लगा जैसे देवी का रूप, जैसे मां का महत्व, जैसे बहन का स्नेहत्व, जैसे बेटी का प्रेमत्व, यदि बच्चियां गाती- मैं वीरांगना झांसी वाली, मैं दुर्गा जैसी मर्दानी, मैं पद्मिनी जैसी क्षत्राणी, मैं हाडी जैसी प्रेमानी लेकिन छोटी सी बच्ची को फैशन की कठपुतली बनाकर पूरा मेकअप कर गंदी भाव भंगिमाएं के साथ रील बनाकर क्या दिखाना चाहते हैं? छोटी बच्चियों से जब बलात्कार होता है तो अर्द्धनग्न कपड़ों में घूमती बेटियां व पीठ दिखाती हुई महिलाएं कहती हैं कि क्या वह भी अर्धनग्न कपड़ों में रहती है या उसको भी दुपट्टे की जरूरत होती है? उसको तो नहीं होती लेकिन अर्धनग्न कपड़ों द्वारा कमार-पीठ दिखाती हुई महिलाओं, अश्लील ड्रेस पहनी हुयी लड़कियों को देखकर एक कामुक व्यक्ति की वासना 3 साल की बच्ची पर जाकर जरूर फूट जाती है। जिम्मेदारी हमारी भी है।।
हे नारी! हे देवी! तू जाग। तरक्की के नाम पर शराब पीना, सिगरेट का धुआं उड़ाना, क्लबों में कमर मटकना, अश्लील इसारे करना, अर्धनग्न वस्त्र धारण करना- ये तेरा जागरण नहीं है, तेरा बड़प्पन नहीं है ये तेरा पतन है पतन, जो शुरू हो चुका है। जिसमें कितनी ही बेटियों को अपनी जान देनी पड़ेगी। इसलिए देवियों अपने जीवन में सादगी लाओ, संयम लाओ, सदाचार लाओ, चरित्रता लाओ, संस्कार लाओ और पैदा करो संस्कारी, चरित्रवान संताने। वह संताने जो कहें- मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, जो कहें- यत्र नार्यस्तु पूज्यतें रमंते जत्र देवताः, जो कहे- नारी तू नारायणी। अन्यथा यह बेटियों-बहनों के साथ अन्याय रुकेगा नहीं। कब कहां छोटी-बड़ी कलियां नौंच दी जाएंगी आपको पता भी नहीं चलेगा? पता नहीं कब कहां दरिंदे हबसी ऐसे अमानवीय कृत्यों को अंजाम देते रहेंगे, न जाने और कहां कहां ऐसे दरिंदो के चंगुल में मेरे देश की बेटियां गिड़गिड़ा रही होंगी?
शासन-प्रशासन का वही रवैया चलता रहेगा। इसलिए श्रेष्ठ विचार, अच्छे संस्कार, सभ्य समाज के सूत्र पर हम सबको चलना पड़ेगा।

लेखिका
प्रोफेसर (डॉ.) अर्चना प्रिय आर्य
अध्यक्ष-संस्कार जागृति मिशन

Dainik Lalsa
Author: Dainik Lalsa

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