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July 23, 2024 5:37 pm

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श्रीमद्भागवत कथा में कृष्ण सुदामा रूकमणी विवाह एवं राजा परीक्षित मोक्ष कथा सुन भाव विभोर हुए श्रोताए नरौरा, नोहटी और रूदायन में हुआ श्रीमद्भागवत कथा का समापन

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गांव सिताहरी के भक्तो द्वारा ऊंचा टीला नरोरा गंगा घाट पर कराई जा रही श्रीमदभागवत कथा मे छठे दिवस की कथा मे श्री धाम वृन्दावन से आये कथा व्यास श्रद्वेय पंडित राधे तन्नू शास्त्री जी ने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र के कोप से ब्रजवासियो की रक्षा एवं कंस वध लीला के बाद रुक्मणि विवाह तथा राजा परीक्षित मोक्ष की कथा का रोचक वर्णन किया। जिसे सुन भक्तो ने आंनद के साथ नृत्य करते हुए भाव विभोर हो गये।
गुरूवार को कथा व्यास ने रुक्मणी विवाह व सुदामा चरित्र और राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा सुनाई, जिसे सुनकर भक्तगण भाव विभोर हो गए। कथा व्यास ने कहा कि विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी बुद्धिमान, सुंदर और सरल स्वभाव वाली थीं। पुत्री के विवाह के लिए पिता भीष्मक योग्य वर की तलाश कर रहे थे। राजा के दरबार में जो कोई भी आता वह श्रीकृष्ण के साहस और वीरता की प्रशंसा करता। कृष्ण की वीरता की कहानियां सुनकर देवी रुक्मणी ने उन्हें मन ही मन अपना पति मान लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने सभी राजाओं को हराकर विदर्भ की राजकुमारी रुक्मणी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। इस अवसर पर आकर्षक वेश-भूषा में श्रीकृष्ण व रुक्मिणी विवाह की झांकी प्रस्तुत कर विवाह संस्कार की रस्मों को पूरा किया गया। राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा का विस्तार पूर्वक वर्णन किया। इस दौरान इस दौरान यज्ञाचार्य अवनीश भारद्वाज, परीक्षित ज्वाला प्रसाद दीक्षित तथा रानी के रूप में गायत्री देवी एवं यज्ञ यजमान श्रीमती रजनी शर्मा, तरुण शर्मा, प्रशांत दीक्षित, श्रीमती माधुरी दीक्षित, जितेंद्र दीक्षित, श्रीमती वंदना दीक्षित, योगेश दीक्षित-श्रीमती गरिमा दीक्षित, वहीं कथा अयोजन में गिरजा देवी, सोनी दीक्षित, नेहा दीक्षित, अनंत दीक्षित, वंश दीक्षित, शिवांग दीक्षित, मुदित दीक्षित, मौजूद थे।
गांव रूदायन में चल रहे संगीतमय श्रीमद्भाभागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान व्यास पीठ पर विराजमान परम पूज्य श्री अनंतानंत दास जी महाराज (मलूक पीठ पुजारी) ने सुदामा प्रसंग का सुंदर रूप से चरित्र वर्णन किया। इसके बाद मौजूद श्रोता कथा सुनकर भाव विभोर हो गए।
गुरूवार को कथा व्यास ने कहा कि कृष्ण और सुदामा की निस्वार्थ मित्रता की मिसाल आज भी दी जाती है। इस प्रसंग को लेकर कथावाचक ने श्रोताओं के आंख में पानी भर दिया। कथा के अंतिम दिन भी श्रीमद्भागवत का रसपान पाने के लिए गांव सहित आसपास गांव के काफी संख्या में भक्तों की भीड़ जमा हो गई। कथावाचक ने भागवत कथा का समापन करते हुए कई कथाओं का सारांश भक्तों को श्रवण कराया। जिसमें भगवान कृष्ण के 16 हजार शादियां की प्रसंग, कृष्ण रुक्मणी का मिलन एवं विवाह, सुदामा प्रसंग और परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई। इन कथाओं को सुनकर मौजूद श्रोता भाव विभोर हो गये। भक्तों को भागवत को अपने जीवन में उतारने की बात कही। साथ ही भक्तों को बताया कि श्रीमद् भागवत कथा का सात दिनों तक श्रवण करने से मनुष्य का उद्धार होता है। कथा से समाज में सद्भाव कायम होता है। कथा समापन के बाद हवन एवं प्रसाद वितरण किया गया। इस दौरान राजा परीक्षित के रूप मे रिसेंन्द्र शर्मा तथा रानी रूप मे श्रीमती मनु देवी, श्री रामचैक मंदिर महंत श्री केशव दास जी, रुपेश उपाध्याय, खगेन्द्र शास्त्री, शुभम उपाध्याय, अरविन्द, नमन मिश्रा, नमन उपाध्या, मोहन, मनोज पण्डित, सहित तमाम ग्रामीण भक्त मौजूद थे।
वहीं मडराक के गांव नोहटी में चल रहे संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान कथा व्यास कन्हैया शास्त्री जी महाराज ने बताया कि कृष्ण और सुदामा के जीवन का वर्णन करते हुए बताया कि सुदामा जी भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र थे।
कथा व्यास ने बताया कि श्री कृष्ण से उनकी मित्रता ऋषि संदीपनी के गुरुकुल में शिक्षार्जन के समय हुई। सुदामा जी अपना व पत्नी तथा बच्चे का भरण पोषण ब्राह्मण रीति के अनुसार भिक्षा मांग कर करते थे। सुदामा इतने में ही संतुष्ट रहकर हरि भजन करते रहते थे। एक दिन वह अपनी पत्नी के कहने पर सहायता के लिए द्वारकाधीश श्री कृष्ण के पास गए। उनकी दशा देखकर तीनों लोकों के स्वामी के आंखों से आंसू आ गए। उन्होंने अपने मित्र सुदामा की सेवा करके उन्हें वहां से विदा कर दिया। जब सुदामा जी अपने नगर पहुंचे तो उन्होंने पाया की उनकी टूटी-फूटी झोपड़ी के स्थान पर सुन्दर महल बना हुआ है। सुदामा चरित्र की कथा के दौरान जब भजन देखो देखो ये गरीबी ये गरीबी का हाल, कृष्ण के दर पे विश्वास लेके आया हूं, मेरे बचपन का यार है मेरा श्याम यही सोच कर मैं आस करके आया हूं। अरे द्वारपालो कन्हैया से कह दो दर पे सुदामा गरीब आ गया है,भटकते भटकते ना जानें कहा से तुम्हारे महल के करीब आ गया है। आकर्षक झांकी के साथ मंचन हुआ तो पंडाल में मौजूद लोग झूमकर नाचने लगे। वहीं कथा व्यास ने राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा को भी विस्तार से सुनाया। कथा के माध्यम से कथावाचक ने संदेश दिया कि चाहे कितनी भी विपत्ती आए मानव को धैर्य नहीं खोना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण को जन्म के पहले से ही विपत्तियों ने घेरे रखा। भगवान का कारावास में जन्म हुआ। जन्म के साथ ही भगवान को मां से अलग होना पड़ गया । नंदग्राम में भी राक्षसी पूतना ने दूध के साथ जहर पिलाने लगी। जब गोपियों का साथ मिला तो साथियों का साथ छूट गया। इसके बाद भी भगवान हमेशा मुस्कुराते रहे। मानव को विपत्ती के कठिन परीक्षा को मुस्कुराकर पार कर देनी चाहिए। कथा समापन पर भागवत आरती उतारकर प्रसाद वितरण किया। इस दौरान इस दौरान में परुषोतम दास जी महाराज, अजीत सिंह तौमर, विमल महाजन, मुन्नीदेवी, प्रेमवती, राधा, मीनू, नैना, अन्नूशिला देवी, आदि लोग मौजूद रहे।

sunil sharma
Author: sunil sharma

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