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June 12, 2024 11:31 pm

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भव्य कलश शोभायात्रा के साथ श्रीमद्भागवत कथा शुरू

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सासनी-14 मार्च। आगरा अलीगढ राजमार्ग स्थित श्री राधे-राधे गार्डन में भव्य कलश शोभयात्रा के साथ श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ का शुभारंभ किया गया। जिसमें सैकडों महिलाओं ने अपने सिर पर सुसज्जित शोभायमान कलशों को रखकर भव्य शोभायात्रा में सहभागिता की। इससे पूर्व यज्ञाचार्य राजकृष्ण शास्त्री ने विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना कर हवन यज्ञ किया, जिसमें यजमानों ने आहूतियां देकर शांति कामना की। कलश शोभायात्रा के बाद विश्व विख्यात भागवताचार्य अतुल कृष्ण शास्त्री महाराज ने संगीत स्वरलहरियों के मध्य अपनी मधुरवाणी से धंुधकारी और गोकर्ण कथा का रोचक वर्णन किया।


गुरूवार को भव्य कलश शोभयात्रा श्री राधे-राधे गार्डन से शुरू होकर कस्बा के विभिन्न बाजारों से होते हुए पुनः कथा स्थल पहुंची जहां भागवताचार्य ने धुंधकारी और गोकर्ण की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि गोकर्ण एक सीधा और साधु स्वभाव का व्यक्ति था और उसका भाई धुंधकारी जैसा नाम वैसा काम आतंकी स्वभाव के कारण सभी को कष्ट पहुंचाता था। कथा में सुनाया कि धुंधकारी की मौत के बाद जब उसे मोक्ष नहीं मिला तो वह तडपने लगा और उसे नरकीय कष्ट भोगने पड रहे थे। तब गौकर्ण ने धुंधकारी को मोक्ष की भावना से श्रीमद्भागवत कथा का अयोजन किया जिसमें धुंधकारी को भी निमंत्रित किया। जब धुंधकारी कथा श्रवण का आया तो वहां अपने पापांे के कारण वेदमंत्रोच्चारण से भी उसे कष्ट होने लगा। तब धुंधकारी को एक बांस में बैठाया गया, जहां धुंधकारी ने कथा श्रवण की और सातवें दिन उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। भागवताचार्य ने कथा का सार बताते हुए कहा कि कहा कि भागवत कथा के श्रवण करने से ही मनुष्य में भक्ति और ज्ञान वैराग्य की भावना जागृत होती है, और इसके भाव मात्र से अचेत पड़े व्यक्ति में भी चेतना जागृत हो जाती है। मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण है। जो भक्तगण भागवत कथा का श्रवण करते हैं उनका कल्याण निश्चित ही होता है। तथा शरीर शुद्ध एवं आत्मा मोक्ष को प्राप्त होती है। बड़े भाग्य से मानव तन मिलता है, इस मानव शरीर को मानव कल्याण में समर्पित करना चाहिए। इस दौरान प्रमोद कुमार वाष्र्णेय, भगवानदास वाष्र्णेय, शैलेश वाष्र्णेय, सचिन वाष्र्णेय, ललित वाष्र्णेय, कृष्णकांत वाष्र्णेय, एवं समस्त वाष्र्णेय परिवार तथा श्रोता भक्त मौजूद थे।

dainiklalsa
Author: dainiklalsa

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