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July 22, 2024 10:24 am

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जब बिदुरानी ने खिलाए केले के छिलके भाव विव्हल हो गये श्रीकृष्ण

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मडराक के गांव नोहटी में शुक्रवार को सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान कथा व्यास कन्हैया शास्त्री जी महाराज ने बताया कि कौरवो और पांडवो के बीच संधि कराने भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर आये थे, तभी विदुरानी जी जो की मथुरा से ही थी वे अधीर हो गयी कि मेरे मायके से श्रीकृष्ण जी आ रहे है। उनके मन में ये विचार आया की क्या वो मेरे घर आएंगे, दुर्योधन का राजमहल छोड़ क्या वो मुझ गरीब के घर आएंगे ?? ये सोचकर विदुरानी जी ने भोजन कर लिया और भगवान् को याद कर अपने काम में लग गयीं। मगर भगवान् तो भावना देखते है वो दुर्योधन के राजमहल को छोड़ निष्पक्ष विदुर जी के घर भोजन करने पहुंच गए।

बुआ भतीजा तेरे घर आया है भोजन बनाया है या चूल्हा ठंडा कर दिया है? भगवान् की आवाज सुन विदुरानी जी घबरा कर घर से बहार निकलती है और भगवान् श्रीकृष्ण को देखते ही भाव-विभोर हो जाती है. भगवान् को आसान देकर वो रसोई में गयी तो भोजन समाप्त हो चुका था अतः वो केले लेकर आ गयीं। भगवान् को देखकर मोहित हुई विदुरानी जी केले को नीचे फेकने लगी और छिलके उन्हें खिलाने लगीं। .भक्त के प्रेम को देखकर भगवान् छिलके ही खाने लगे। इतने में विदुर जी आ गए और विदुरानी को चेताया और खुद केले को छील के गिरी भगवान् को खिलने लगे तो भगवान् विदुर जी से कहते है बुआ की भावना जैसा स्वाद नहीं है। कथा व्यास ने बताया कि भगवान भाव के भूखे हैं। जो भक्त भाव से भजता है भगवान उसे सांसारिक कष्टों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाते है। इस दौरान में परुषोतम दास जी महाराज, अजीत सिंह तौमर, विमल महाजन, मुन्नीदेवी, प्रेमवती, राधा, मीनू, नैना, अन्नूशिला देवी, आदि लोग मौजूद रहे।
वहीं दूसरी ओ गांव रूदायन में चल रहे श्रीमद्भाभागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान व्यास पीठ पर विराजमान परम पूज्य श्री अनंतानंत दास जी महाराज (मलूक पीठ पुजारी) ने बताया कि सृष्टि में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता है। वह या तो विचारों के माध्यम से सक्रिय है अथवा क्रियाओं के माध्यम से या फिर कारण बन कर कर्म में योगदान कर रहा है। जीव-जंतु हों या मनुष्य, कोई भी अकर्मण्य नहीं है और न ही कभी रह सकता है। विद्वानों ने मुख्य रूप से तीन प्रकार के कर्म बताए हैं। जिनमें एक होता है क्रियमाण कर्म, जिसका फल इसी जीवन में तुरंत प्राप्त हो जाता है। दूसरा संचित कर्म होता है, जिसका फल बाद में मिलता है। तीसरा होता है प्रारब्ध। यदि विपरीत परिस्थितियों में भी लोग सुखी रहकर जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं तो इसका श्रेय उनके संचित कर्म को जाता है। जब रावण अपने जीवन में अत्यधिक शक्तिशाली एवं सुखी था तब यह उसके संचित कर्म का परिणाम था। मगर उसी रावण के घर कोई दीया जलाने वाला तक नहीं रहा तो यह उसका प्रारब्ध था। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि ‘अपने विचारों पर नियंत्रण रखो, नहीं तो वे तुम्हारा कर्म बन जाएंगे और अपने कर्मो पर नियंत्रण रखो, नहीं तो वे तुम्हारा भाग्य बन जाएंगे। इस दौरान इस दौरान राजा परीक्षित के रूप मे रिसेंन्द्र शर्मा तथा रानी रूप मे श्रीमती मनु देवी, श्री रामचैक मंदिर महंत श्री केशव दास जी, रुपेश उपाध्याय, खगेन्द्र शास्त्री, शुभम उपाध्याय, अरविन्द, नमन मिश्रा, नमन उपाध्या, मोहन, मनोज पण्डित, सहित तमाम ग्रामीण भक्त मौजूद थे।

sunil sharma
Author: sunil sharma

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